गुफ्तगू
जी हाँ दीवारों से बातें करता हूँ , किताबों से , छत पे लगे पंखे से , रेल से , ज़िंदगी की ठेलमठेल से , और भी बहुत से बेज़ानों और बेज़ुबानों से अकेले में गुफ्तगू करता हूँ और खूब करता हूँ। और भी लोग करते होंगे मैं कोई अजूबा नहीं, बस थोड़ा सा अलग ये है की मुझे इंसानों से बातें करने में थोड़ी हिचकिचाहट होती है। और हो भी क्यों न , इंसान बातों के मतलब निकालते हैं और कई दफा तो बातों से मतलब निकालते हैं। बेजान चीज़ें बातें नहीं समझती ऐसा लोगों का शक हैं और शक की गुंजाइश भी है आखिर ये जबाब जो नहीं देती, बातों से बंटवारे का फसाद नहीं करती , बातों से रूठती नहीं, बातों से शर्माती नहीं और बातों से खिलखिलाकर हंसती भी नहीं। शक में हकीकत कितना मैं अभी नहीं कह सकता, जब बेजान हो जाऊंगा तो जान पाउँगा। मगर एक बात जिसपे शक नहीं ,कि इनसे बात करने में मुझे कभी डर नहीं लगता मतलब एकदम बेख़ौफ़ बेधड़क सब बक देता हूँ , इंसानों से इतना नहीं खुल पाता। थोड़े अजीब लगता है न इंसानों के बीच, कई दफा जैसे सब के सब तुमसे कुछ पूछना चाहते हो और कई दफा जैसे किसीको तुमसे कोई मतलब ही नहीं है। ये बातें शायद फालतू ल...