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अच्छा सुनो

 पता है तीफा तुम सबकी बातों में मत आया करो। हमारी इक जमात है और उसका इक खास दायरा हम उससे बाज नहीं आते। हमारी तंगदिली और खुशफहमी का आलम ये है कि औरों पर बदकिरदारी के इल्जामात से खुद के पाक होने का तार्रुफ करते हैं, खैर मेरी बात अलग है खासकर जब मैं अपनी जमात से इतर बस खुदी के दायरे में होता हूं  ,खैर इसमें कोई शक नहीं कि शायद ऐसा हम सभी को लगता हो। अच्छा छोड़ो न बातों बातों में असल मसला तो दरकिनार हो गया, तो बात यूं है कि अरसे बाद मैंने अपनी दीवार पर तस्वीर फिर सजा ली है। तुम्हारी ये न जाने कौन सवीं दस्तक से सहरा में फिर से फूल खिलने लगे हैं, दरख्तो पे परिंद लौट आए हैं। शायराना बातों से इतर और भी एक बात है कि अब चाय में चीनी कम नहीं लगती। हां मैं इस बार किसी को कुछ बताऊंगा नहीं, जानता हूं लोग नहीं समझते, और तो और नाजुक जख्मों पर नमक मलने से राहत कहीं मिलती है भला। मैंने जब भी किसी को तुम्हारे लौट आने की बात बताई तो कोई नहीं समझा सब उसे मेरा ख्याल समझते हैं झूठ समझते हैं । अब तुम्ही बताओ ना मैं भला ऐसा झूठ क्यों रचने लगा। मैं भी न इतनी रात कौन सी पंचायत ले के बैठ गया। वैसे ए...