अच्छा सुनो
पता है तीफा तुम सबकी बातों में मत आया करो। हमारी इक जमात है और उसका इक खास दायरा हम उससे बाज नहीं आते। हमारी तंगदिली और खुशफहमी का आलम ये है कि औरों पर बदकिरदारी के इल्जामात से खुद के पाक होने का तार्रुफ करते हैं, खैर मेरी बात अलग है खासकर जब मैं अपनी जमात से इतर बस खुदी के दायरे में होता हूं ,खैर इसमें कोई शक नहीं कि शायद ऐसा हम सभी को लगता हो।
अच्छा छोड़ो न बातों बातों में असल मसला तो दरकिनार हो गया, तो बात यूं है कि अरसे बाद मैंने अपनी दीवार पर तस्वीर फिर सजा ली है। तुम्हारी ये न जाने कौन सवीं दस्तक से सहरा में फिर से फूल खिलने लगे हैं, दरख्तो पे परिंद लौट आए हैं। शायराना बातों से इतर और भी एक बात है कि अब चाय में चीनी कम नहीं लगती।
हां मैं इस बार किसी को कुछ बताऊंगा नहीं, जानता हूं लोग नहीं समझते, और तो और नाजुक जख्मों पर नमक मलने से राहत कहीं मिलती है भला। मैंने जब भी किसी को तुम्हारे लौट आने की बात बताई तो कोई नहीं समझा सब उसे मेरा ख्याल समझते हैं झूठ समझते हैं । अब तुम्ही बताओ ना मैं भला ऐसा झूठ क्यों रचने लगा।
मैं भी न इतनी रात कौन सी पंचायत ले के बैठ गया। वैसे एक बात कहूं, तुम न इस बार बता के जाना पिछले बार की तरह चुपके से नहीं।
जब पता रहता है तो कहीं न कहीं एत्मीनान भी रहता है कि मैं फिर बुलाऊंगा इन बीतते लम्हों को, अभी जितनी भी करूं कद्र कुछ कमी रह ही जायेगी, मेरे मुस्तकबिल के चादर में बेशकीमती मोती नहीं बन रहे ये बेरहम लम्हें। हां बेसक दौरानिया ए इंतजार में कटौती की गुंजाइश तो है। सुनो तीफा, अगली दफा तुम जब लौटना तो कल के चश्मे से मेरे आज का इंसाफ न करना। मैं बेबस दीवाना हूं चांदनी की फ़िराक में जुगनू की चमक भूल जाता हूं और जज़्बात की औकात इतनी है कि धूप और छांव के बीच तुम धीमें से सरक लेते हो और मैं अपने ही बुने दीन में काफिर हो जाता हूं।
इस बार तुम मुझे बता के जाना बस, मैंने न वो नीला कुर्ता भी तैयार रखा है स्टेशन तक खुद छोड़ने आऊंगा। और हां तुम वहां का पता क्यों नहीं देती, मतलब मैं जो भी लिखता हूं वो तुम तक कैसे पहुंचाऊं , और बात जब तलक तुम तक न पहुंचे लगता नज्म मुकम्मल ही न हुई हो। अच्छा चलो सो जाओ तुम न ज्यादा देर तक जगती हो तो सुबह सुबह तुम्हारी आंखें भैंगी लगती हैं, हां हां ठीक नहीं छेड़ेंगे चलो गुड नाईट।
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